आत्म - बोध


आज फिर मैं चल पड़ा हूं , उन्नयन की उस दिशा में
चाह थी जिसकी मुझे , उद्विग्न मन की हर दशा में।

आत्म मंथन से निकल कर , तथ्य का दामन पकड़ कर
चल पड़ा उल्लसित होकर , आज मैं हूंकार भरकर।



ललकार कर के कह रहा हूं , आज फिर मैं इस गगन से
कर लिया निश्चय है मैंने , आज दृढ़ता की लगन से।

लग चुका है ढेर अब , अनगिनत प्रश्नो का यहाँ
ढूँढना है अब मुझे निहित उत्तरों का जहान ।

दूसरों पर दोष मढ़कर , बहोत दिन बचते रहे
अब स्वयं को है परखना , चाहे फल कुछ भी रहे।

डिगने का अब संशय नहीं ,
मंझधार का भी भय नहीं।
खुद पर भरोसा अब मुझे ,
इस बोध की है लय बही।। 

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